नई दिल्ली
बिहार चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर और JSP को बड़ा झटका
14 नवंबर 2025 को आए बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम राजनीति की कई परतें खोलने वाले साबित हुए। यह सिर्फ महागठबंधन के लिए हार नहीं थी, बल्कि प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसूरज पार्टी (JSP) के लिए भी भारी झटका साबित हुई। 238 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली JSP एक भी सीट जीतने में नाकाम रही और 236 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई।
हालांकि सीटें न जीत पाने के बावजूद JSP ने चुनाव में “वोटकटवा” के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पार्टी ने 35 सीटों पर ऐसा मत हासिल किया, जो विजेताओं के जीत अंतर से भी अधिक था। दिलचस्प बात यह रही कि JSP ने दोनों ही गठबंधनों—एनडीए और महागठबंधन—को नुकसान पहुंचाया। विपक्ष लगातार इस पार्टी पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप लगाता रहा, परंतु आंकड़े बताते हैं कि JSP ने दोनों खेमों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं।
35 सीटों पर JSP ने बिगाड़ा समीकरण
चुनावी आंकड़ों के अनुसार, 35 ऐसे विधानसभा क्षेत्र थे जहां JSP के वोट जीत के मार्जिन से अधिक थे। इनमें से 19 सीटें एनडीए ने जीतीं, जबकि महागठबंधन को 14 सीटों पर जीत मिली। इसके अलावा AIMIM और BSP को भी एक-एक सीट पर JSP के वोटकटवा प्रभाव का लाभ मिला।
3.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ JSP कई स्थापित पार्टियों जैसे AIMIM और BSP से आगे रही। कांग्रेस के 8.3% वोट शेयर के मुकाबले JSP का प्रदर्शन अपने पहले चुनाव में उल्लेखनीय रहा। पार्टी 115 सीटों पर तीसरे स्थान पर और एक सीट पर दूसरे स्थान पर रही, जो बताता है कि JSP के वोट कहीं न कहीं सत्ता संतुलन को प्रभावित कर रहे थे।
विस्तृत विश्लेषण यह संकेत देता है कि JSP के वोटों की वजह से जेडीयू को 10, बीजेपी को 5, एलजेपी-आरवी को 3 और आरएलएम को 1 सीटों पर फायदा हुआ। वहीं महागठबंधन में आरजेडी को 9 और कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं।
‘नौवीं फेल’ का नरेटिव और युवा वोटों पर प्रभाव
प्रशांत किशोर का चुनाव अभियान मुख्यतः आरजेडी नेता तेजस्वी यादव पर केंद्रित था। उन्होंने लगातार रैलियों और सोशल मीडिया पर तेजस्वी यादव को “नौवीं फेल” कहकर निशाना बनाया और “जंगल राज” की याद दिलाई। इस नरेटिव ने आरजेडी की युवा छवि को काफी नुकसान पहुँचाया।
युवा मतदाताओं (60% आबादी) को प्रभावित करने में JSP सफल रही और अंदाजा है कि आरजेडी का युवा वोट शेयर लगभग 5% तक गिरा। रोजगार, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दों पर JSP का फोकस युवाओं को आकर्षित कर गया। किशोर का तेजस्वी की शिक्षा पर सीधा वार और “अशिक्षित नेतृत्व” का तर्क चुनावी राजनीति में गूंजता रहा।
बीजेपी पर सीमित हमला और एनडीए को अप्रत्यक्ष लाभ
किशोर ने बीजेपी का विरोध सीमित स्तर पर किया। उनका मुख्य आक्रमण तेजस्वी और नीतीश के खिलाफ केंद्रित रहा। मोदी और अमित शाह पर उन्होंने खुलकर बयान नहीं दिए, जिससे एनडीए को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिला।
बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर JSP ने युवाओं को अपनी ओर खींचा, जो सामान्यतः महागठबंधन की ओर झुकते। इन वोटों का बंटवारा महागठबंधन के लिए नुकसानदायक साबित हुआ।
नीतीश बनाम तेजस्वी—किशोर की पसंद ने बदला समीकरण
एक इंटरव्यू में किशोर ने साफ तौर पर कहा था कि यदि उन्हें नीतीश और तेजस्वी में किसी एक को चुनना हो, तो वे नीतीश को चुनेंगे। इस बयान ने स्पष्ट संकेत दिया कि JSP का नरेटिव किस दिशा में झुक रहा है। परिणामस्वरूप, इसका फायदा एनडीए और विशेषकर जेडीयू को मिला।
कुल मिलाकर, JSP ने पहली पारी में भले ही सीटें नहीं जीतीं, लेकिन उसने चुनावी समीकरणों को मजबूती से प्रभावित किया—कई जगहों पर “किंगमेकर” नहीं पर “किंगब्रेकर” का रोल निभाते हुए।