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प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: WHO की सीमा 50, दिल्ली-NCR में एयर क्वालिटी 450 पार

rana 17 Nov 2025 1 min read
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नई दिल्ली

दिल्ली–NCR में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार गंभीर होता जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों के अनुसार कई इलाकों में AQI 450 से ऊपर दर्ज किया गया, जो कि गंभीर और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक श्रेणी में आता है। इस बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को कड़े निर्देश जारी किए और दीर्घकालिक समाधान तैयार करने पर जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मुद्दे पर दिखाई कड़ी नाराज़गी

मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ—जिसमें जस्टिस विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी. अंजारिया भी शामिल थे—ने सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों की कार्यशैली पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि हर साल दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु प्रदूषण का संकट गहराता है, परंतु समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

CJI गवई ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल अल्पकालिक कदमों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। कोर्ट के अनुसार, अगर सरकारें हर साल केवल निर्माण बंद करने, स्कूलों को छुट्टी देने या वाहनों पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने जैसे निर्णय लेती रहेंगी तो हालात कभी नहीं सुधरेंगे। उन्होंने इसे “अस्थायी राहत” बताया, जो समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचती।

निर्माण गतिविधियों पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। अदालत ने कहा कि पूरी तरह निर्माण बंद कर देने से लाखों मजदूरों की आजीविका प्रभावित होती है, खासकर उन राज्यों से आए मजदूरों की जो रोज़ कमाने और खाने पर निर्भर होते हैं—जैसे यूपी और बिहार से आए श्रमिक।

CJI ने कहा, “हम सिर्फ एक पक्ष देखकर आदेश जारी नहीं कर सकते। निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं और गरीब मजदूरों पर इसका सीधा असर पड़ता है।” अदालत ने इस बात को दोहराया कि सरकारों को किसी भी निर्णय से पहले जमीनी हकीकत, सामाजिक प्रभाव और आर्थिक परिणामों को ध्यान में रखना चाहिए।

सरकार को संयुक्त रणनीति तैयार करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी कि वह पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश समेत सभी NCR राज्यों के साथ एक समन्वित बैठक करे। अदालत ने कहा कि प्रदूषण केवल दिल्ली का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत की एक साझा समस्या है, जिसकी रोकथाम के लिए सभी राज्यों को मिलकर कार्रवाई करनी होगी।

कोर्ट ने कहा कि पराली जलाने, औद्योगिक प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाले धुएँ, निर्माण धूल और कचरे के खुले में जलने जैसे कारणों पर अलग-अलग रणनीतियाँ बनाकर उन्हें एक बड़े फ्रेमवर्क में शामिल किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि अगर राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय मजबूत नहीं हुआ, तो हर साल यही स्थिति दोहराई जाएगी और दिल्ली–NCR के करोड़ों लोगों की सेहत पर संकट बना रहेगा।

WHO की सीमा 50, लेकिन दिल्ली में AQI पहुंचा 450 के पार

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार सुरक्षित वायु गुणवत्ता की सीमा PM2.5 के लिए 50 के आसपास मानी जाती है, लेकिन दिल्ली–NCR में हवा इससे लगभग दस गुना अधिक प्रदूषित है। कई इलाकों में 450 से अधिक AQI रिकॉर्ड किया गया, जो कि ‘गंभीर’ स्तर है और स्वस्थ लोगों के लिए भी खतरनाक माना जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार इस स्तर का प्रदूषण सांस की बीमारियों, एलर्जी, अस्थमा, फेफड़ों के संक्रमण और हृदय रोगों के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति अत्यंत खतरनाक मानी जाती है।

कोर्ट का ध्यान: दीर्घकालिक समाधान ही स्थायी रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक ऐसी नीति तैयार करनी होगी जो आने वाले वर्षों में भी असरदार साबित हो। इसमें आधुनिक तकनीक का उपयोग, औद्योगिक उत्सर्जन की निगरानी, वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण, कचरा प्रबंधन, पराली के विकल्प, और हरित आवरण बढ़ाने जैसी रणनीतियाँ शामिल होनी चाहिए।

अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह जल्द से जल्द विस्तृत रिपोर्ट पेश करे, जिसमें यह बताया जाए कि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक योजना क्या है और उसे लागू करने के लिए राज्य सरकारों के साथ किस प्रकार तालमेल बनाया जाएगा।

जैसे-जैसे सर्दियां नजदीक आ रही हैं, हवा की गति कम हो रही है, जिसके कारण प्रदूषण का स्तर और भी बढ़ने की संभावना है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि सरकारें मिलकर एक ठोस और प्रभावी नीति बनाएंगी, जो दिल्ली–NCR के लोगों को प्रदूषण के इस दुष्चक्र से बाहर निकाल सके।