नई दिल्ली: बायोकॉन की कार्यकारी अध्यक्ष किरण मजूमदार-शॉ एक वायरल वीडियो पर की गई अपनी टिप्पणी को लेकर चर्चा में हैं। यह वीडियो हवाई अड्डों पर दी जाने वाली व्हीलचेयर सहायता सेवा के संदर्भ में है, जिसमें दावा किया गया कि कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बड़ी संख्या में यात्री इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, जबकि सभी को वास्तविक रूप से इसकी आवश्यकता नहीं होती।
सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस वीडियो में कई यात्रियों को व्हीलचेयर पर बैठकर बोर्डिंग के लिए जाते हुए दिखाया गया। पोस्ट में यह संकेत दिया गया कि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने से एयरपोर्ट स्टाफ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और कभी-कभी वे यात्री भी प्रभावित होते हैं जिन्हें सचमुच चलने-फिरने में कठिनाई होती है या जिनकी स्वास्थ्य स्थिति नाज़ुक होती है।
इसी संदर्भ में किरण मजूमदार-शॉ ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देते हुए सुझाव दिया कि यदि एयरपोर्ट प्रबंधन व्हीलचेयर सहायता के लिए अतिरिक्त शुल्क लगाए, तो शायद अनावश्यक मांग अपने आप कम हो सकती है। उनका तर्क था कि शुल्क लगाने से केवल वही लोग यह सुविधा लेंगे जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत होगी, और व्यवस्था अधिक सुव्यवस्थित हो सकेगी।
उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ उपयोगकर्ताओं ने कहा कि व्हीलचेयर जैसी सेवा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और अगर किसी तरह का शुल्क या कड़ी प्रक्रिया व्यवस्था को संतुलित बनाती है, तो इस पर विचार किया जा सकता है। समर्थकों का मानना है कि इससे एयरपोर्ट और एयरलाइंस दोनों को वास्तविक जरूरतमंद यात्रियों की पहचान और प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी।
दूसरी ओर, कई लोगों ने यह चिंता भी जताई कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ से वे यात्री प्रभावित हो सकते हैं जो पहले से ही स्वास्थ्य या उम्र से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनका कहना है कि नीति बनाते समय दिव्यांग, वरिष्ठ नागरिकों और अस्थायी रूप से अस्वस्थ यात्रियों की जरूरतों को सबसे पहले रखा जाना चाहिए, ताकि वे बिना किसी झिझक या अतिरिक्त खर्च के सहायता प्राप्त कर सकें।
एविएशन सेक्टर से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस पूरे मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। उनके अनुसार, यात्रियों की वास्तविक मेडिकल जरूरतों की बेहतर डॉक्यूमेंटेशन, उचित वेरिफिकेशन प्रक्रिया और स्टाफ की ट्रेनिंग जैसे कदम दुरुपयोग की संभावना कम कर सकते हैं। वहीं, जन-जागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को यह समझाया जा सकता है कि व्हीलचेयर सहायता प्राथमिक रूप से उन यात्रियों के लिए है जो इसके बिना यात्रा नहीं कर सकते।
किरण मजूमदार-शॉ की टिप्पणी ने ऑनलाइन स्पेस में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है— सुविधा बनाम जिम्मेदारी। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एयरपोर्ट ऑपरेटर, एयरलाइंस और नियामक संस्थाएँ आगे इस विषय पर क्या कदम उठाती हैं और सिस्टम को अधिक संतुलित एवं पारदर्शी बनाने की दिशा में कैसे काम करती हैं।